सुक सुक पटिए दो दाने नी सुकना ता चल ठाणे

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पुरानी शिक्षा नीति यहां से शुरू होती थी। 1 से 5 तक की कक्षा की पढ़ाई में विशेष रूप से इसका प्रयोग किया जाता था। हम अपनी भाषा में इसको (पट्टी) बोलते थे। पहले घर से लिखकर लाते थे। आधी छुट्टी होने से पहले मैडम को बताते थे। फिर आधी छुट्टी में धोते थे। फिर सुखानी अगर धूप ना हो तो उस दिन हवा में जोर जोर से हिलाकर सुखाते थे।अगर ना जल्दी सूखे तो एक प्यारा सा गीत गाते थे (*सुक सुक पटिए दो दाने नी सुकना ता चल ठाणे*)

आधी छुट्टी के बाद इसे फिर से लिखकर मैडम को बता कर घर के लिए छुट्टी हो जाती थी।वैसे खेलने और सिर्फ फोड़ने के काम भी आती थी साथ साथ में कई बार रास्ते में झाड़ियां भी साफ कर देते थे। स्कूल के समय के ऐसे दिन सदा यादगार रहने वाले मुझे नहीं लगता कि आने वाली पीढ़ी अब ऐसी परिस्थितियों और ऐसी शिक्षा से गुजरेगी।
साभार: Nurpur Updates


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