इक आग,इक तपन, रोज़ नयी चाहिए , ये है इनसां की फितरत, कुछ अलग चाहिए

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इक आग,इक तपन,
रोज़ नयी चाहिए ,
ये है इनसां की फितरत,
कुछ अलग चाहिए ।
देश सुख का हो ,
चाहत दिल की ये है ,
साथ दुखों का भी ,
इक नगर चाहिए ।
हकीकत तो ये है,कि
अब वफ़ा ही नहीं ,
बेवफाओं का फिर भी,
भरम चाहिए ।
अपनों से हमें ,चाहे
मिले न कुछ भले ,
गैरों का ही क्यों ,
मगर करम चाहिए।
हमसफ़र हैं सभी,
जब तक है ये सफ़र,
आपको ही क्यों अलग,
पहचान चाहिए ।
छोड़ो उलझन है ये
क्या लिखूं, क्या कहूं,
वक़्त देगा जवाब ,
क्या चाहिए , क्या नहीं चाहिए ।


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