यादों की तितली ,रंग बिरंगी,पकड़ी तो बेरंग हो गई । बहुत चाहा जिसे, सम्भाला भी बहुत ,वही चीज़ अक्सर खो गई। ख्वाहिशों का धुआं करते रहे , इक तमन्ना कहीं बहुत रो गई । जगाते रहे रोज़ आरज़ू इक नई,और एक चाहत दिल में सो गई। ज़िन्दगी पहुंच गई थी वहां ,मौत होते होते, जहां रह गई ।