मां ज्वालामुखी का प्रकटोत्सव रविवार को मनाया जा रहा है। मान्यता के अनुसार मां ज्वालामुखी का जन्मदिन वर्ष में दो बार मनाया जाता है। कोरोना के कारण मंदिर के कपाट दर्शनों के लिए पूरी तरह बंद हैं। प्रकटोत्सव पर मां का शृंगार कर विशेष पूजा-अर्चना की गई। फरवरी में भी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को माता के मूर्ति रूप का प्रकटोत्सव मनाया जाता है। इस बार मां के प्रकटोत्सव पर श्रद्धालु शामिल नहीं हो पाए। करीब 159 परिवारों के पुजारियों ने बारी-बारी मां की पूजा-अर्चना की। पुजारियों ने कोरोना महामारी के खात्मे के लिए भी प्रार्थना की। ज्वालामुखी मंदिर में मां के ज्योति रूप का प्रकटोत्सव व माता कामाख्या देवी मंदिर में आम्बाची उत्सव मनाया जाएगा। गुप्त नवरात्र विशेष होते हैं।
सुबह पांच बजे खुले कपाट
रविवार को मां के प्रकटोत्सव पर सुबह पांच बजे पुजारी ने मंदिर के कपाट खोल दिए। शंख ध्वनि, घंटी वादन व मंत्रोच्चारण के साथ नियमित पूजा हुई। रविवार को भी ज्वालामुखी मंदिर में मां की पांच आरतियां होंगी।
रात को अपने शयन कक्ष में सोने आती हैं मां ज्वाला
मान्यता है कि मां ज्वालामुखी हर रात मंदिर के शयन कक्ष में सोने आती हैं। रात को माता के बिस्तर की साज, सजावट के बाद पुजारी शयन आरती कर माता को सुलाते हैं। पुजारियों की मानें तो सुबह बिस्तर पर सिलवटें होती हैं।
शहनाइयों से गूंजा मंदिर परिसर
मंदिर परिसर शहनाइयों से गूंज उठा। रविवार को मां की आरतियों के समय शहनाई वादकों ने शहनाई बजाकर मां को जन्मदिन की बधाई दी।
यह है मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया। लेकिन अपनी पुत्री सती व उसके पति भगवान शिव को यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया। शिव के अपमान पर सती यज्ञ कुंड में कूद पड़ीं और अपनी देह त्याग दी। भगवान शिव ने व्याकुल होकर सती के शव को कंधे पर उठाया व हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए। भगवान शिव अर्धांगिनी के इस प्रकार हुए देह त्याग पर बहुत व्यथित थे। शिव के इस प्रकार के भयंकर रूप को देखकर देवगणों ने भगवान विष्णु से शिव का क्रोध शांत करने की प्रार्थना की। सती के तांडव प्रहार से बचाने के लिए विष्णु ने सती के शव के अनेकों टुकड़े कर दिए। सती के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरते रहे व जहां-जहां पर सती के अंग गिरे उन्ही स्थानों पर शक्तिपीठों की स्थापना हुई। जिस स्थान पर सती की जीभ गिरी, वहां पर देवी ज्वाला के रूप में प्रकट हुई। यही स्थान कालांतर में श्री ज्वालामुखी के नाम से विख्यात हुआ।
अकबर ने किया था ज्योतियां बुझाने का नाकामयाब प्रयास
कहा जाता है कि ज्वालामुखी में प्रकट दिव्य ज्योतियों की जानकारी मुगल सम्राट अकबर को मिली तो उसने एक नहर का निर्माण करवा कर ज्वालाओं को बुझाने के लिए उन पर पानी छोड़ा। लेकिन ज्वालाएं ज्यों की त्यों जलती रहीं। तत्पश्चात ज्वालाओं को मिटा देने के लिए अकबर ने इन्हें लोहे के तवे से ढक देने का प्रयास किया। लेकिन वह किसी तरह से अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाया। आखिरकार माता भगवती की चमत्कारिक शक्ति से हार मान कर अकबर नंगे पांव स्वयं ज्वालाजी मंदिर गया व सोने का छत्र भेंट किया, लेकिन उसकी भेंट को न स्वीकारते हुए माता ने उसे अज्ञात धातु में परिवर्तित कर दिया, जो आज भी मंदिर में है।










