आपको ये हक़ है,कि मुजरिम
हमें करार दें ,
मोहब्बत हमारा जुर्म है, और
आप चाहें न प्यार दें ।
आपके इल्ज़ाम से,हम भी कम होना चाहेंगे बरी,
आपकी तबियत इनकार हो, और
हम इक़रार दें ।
मिलना किसी बहाने, एहसान खुद ये आपका ,
हमने कब मांगा ये सब, कि आप
हमें उधार दें ।
ये खु़मारी क्यों आपको,मेरे नाम
की चढ़ गई ,
दुश्मनी से थी शुरू,अब दोस्ती
पे उतार दें ।
ज़ुर्म खुद, और सज़ा ग़ैर को, ये मेरी तबियत नहीं,
मोहब्बत तेरे नाम पर,आ ज़िन्दगी निसार दें ।
2020-06-03










