जो जलाये दीये हमने ,
तो अंधेरा बढ़ गया ,
ये क्या हुआ कि अब ए हयात
से कोई मर गया ।
यारों अजब रहा ,
दुनिया का ही चलन ,
मिले जो दोस्ती को,
वो रक़ीब बन गया ।
सफ़र न होती जिंदगी ,
तो बात ही क्या थी ,
मिले न वो, छूटे जो,
कारवां गुज़र गया ।
अजीब शै है ये इंसान,
और उसका ये भरम ,
टूटा हज़ार दफ़ा ,
फिर भी जुड़ गया ।
उम्मीद एक तेरी ,
मेरे ख़ुदा मुझे ,
रोया या हंसा ,
पर दर तेरे ही गया ।










