अभी अभी तो तुमने,
पंख फैलाए थे ,
नीले आसमान पे ,
इन्द्रधनुष बन छाये थे ।
कितनी मोहक थी ,
तुम्हारी हंसी…..
जैसे अंधेरों में ,
दिये जलाये थे ।
माना मृत्यु जीवन का सत्य है,
पर क्या, इसे खुद से लिखना…
सही कृत्य है ?….
हां, रहीं होगी कोई पीड़ा
तुम्हारे अन्दर …
मात- पिता से तो, वो
नहीं होगी बढ़कर ….
कितने स्वप्न , तुम संग
उन्होंने सजाये होंगे ,
जब, तुमने सुन्दर भविष्य
को, क़दम बढ़ाए होंगे …..
तुम उनको ही नहीं,प्रिय
हमारे भी थे ….
तुम्हारे उठते क़दम,
हमको भी प्यारे थे ।
तुमको देते हम ,नम़
आंखों से विदाई हैं …
ओम् शान्ति! .. नवजीवन
की फिर बधाई है …
सुशांत सिंह राजपूत जी
को समर्पित ….










